मनके बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ। फिर हृदयसे ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ। तत्पश्चात् अहंकार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता उत्पन्न हुआ। इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ॥ ६१॥
मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पतिः।
अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत्॥ ६१
मनके बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ। फिर हृदयसे ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ। तत्पश्चात् अहंकार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता उत्पन्न हुआ। इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 368) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/61/