श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.64

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अक्षिणी चक्षुषाऽऽदित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट्।

श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट्॥ ६४

akṣiṇī cakṣuṣā''dityo nodatiṣṭhattadā virāṭ|

śrotreṇa karṇau ca diśo nodatiṣṭhattadā virāṭ|| 64

अर्थ

सूर्यने चक्षुके सहित नेत्रोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा। दिशाओंने श्रवणेन्द्रियके सहित कानोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें