apāṃ rasasya ca yathā tathā buddheḥ parasya ca|| 18
अर्थ
ब्रह्मन्! जिस प्रकार गन्ध और पृथ्वी तथा रस और जलकी पृथक्-पृथक् स्थिति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृति भी एक-दूसरेको छोड़कर नहीं रह सकते॥ १८॥
यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकतः।
अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धेः परस्य च॥ १८
ब्रह्मन्! जिस प्रकार गन्ध और पृथ्वी तथा रस और जलकी पृथक्-पृथक् स्थिति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृति भी एक-दूसरेको छोड़कर नहीं रह सकते॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 372) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/27/18/