श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

देवहूतिरुवाच

पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन्‍न विमुञ्चति कर्हिचित्।

अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयोः प्रभो॥ १७

puruṣaṃ prakṛtirbrahmanna vimuñcati karhicit|

anyonyāpāśrayatvācca nityatvādanayoḥ prabho|| 17

अर्थ

देवहूतिने पूछा—प्रभो! पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य और एक-दूसरेके आश्रयसे रहनेवाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुषको कभी छोड़ ही नहीं सकती॥ १७॥

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