श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

यदा न योगोपचितासु चेतो

मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग२।

अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्याद्

आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहासः॥ ३०

yadā na yogopacitāsu ceto

māyāsu siddhasya viṣajjate'ṅga|

ananyahetuṣvatha me gatiḥ syād

ātyantikī yatra na mṛtyuhāsaḥ|| 30

अर्थ

माताजी! यदि योगीका चित्त योगसाधनासे बढ़ी हुई मायामयी अणिमादि सिद्धियोंमें, जिनकी प्राप्तिका योगके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है, नहीं फँसता, तो उसे मेरा वह अविनाशी परमपद प्राप्त होता है—जहाँ मृत्युकी कुछ भी दाल नहीं गलती॥ ३०॥✎ 323 1597

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
कापिलेयोपाख्याने सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—जते कथम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 373)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

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