श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अष्टांगयोगकी विधि

श्रीभगवानुवाच

योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मज।

मनो येनैव विधिना प्रसन्‍नं याति सत्पथम्॥ १

yogasya lakṣaṇaṃ vakṣye sabījasya nṛpātmaja|

mano yenaiva vidhinā prasannaṃ yāti satpatham|| 1

अर्थ

कपिलभगवान् कहते हैं—माताजी! अब मैं तुम्हें सबीज (ध्येयस्वरूपके आलम्बनसे युक्त) योगका लक्षण बताता हूँ, जिसके द्वारा चित्त शुद्ध एवं प्रसन्‍न होकर परमात्माके मार्गमें प्रवृत्त हो जाता है॥ १॥ यथाशक्ति शास्त्रविहित स्वधर्मका पालन करना तथा शास्त्रविरुद्ध आचरणका परित्याग करना, प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहना, आत्मज्ञानियोंके चरणोंकी पूजा करना,॥ २॥ विषय-वासनाओंको बढ़ानेवाले कर्मोंसे दूर रहना, संसारबन्धनसे छुड़ानेवाले धर्मोंमें प्रेम करना, पवित्र और परिमित भोजन करना, निरन्तर एकान्त और निर्भय स्थानमें रहना,॥ ३॥ मन, वाणी और शरीरसे किसी जीवको न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकतासे अधिक वस्तुओंका संग्रह न करना, ब्रह्मचर्यका पालन करना, तपस्या करना (धर्मपालनके लिये कष्ट सहना), बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्‌की पूजा करना,॥ ४॥ ✎ 324

यह व्याख्या श्लोक 3.28.1 से 3.28.4 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #324 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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