जब योगका अभ्यास करते-करते चित्त निर्मल और एकाग्र हो जाय, तब नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि जमाकर इस प्रकार भगवान्की मूर्तिका ध्यान करे॥ १२॥✎ 326
यदा मनः स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम्।
काष्ठां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकनः॥ १२
जब योगका अभ्यास करते-करते चित्त निर्मल और एकाग्र हो जाय, तब नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि जमाकर इस प्रकार भगवान्की मूर्तिका ध्यान करे॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 374) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)