श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यदा मनः स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम्।

काष्ठां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकनः॥ १२

yadā manaḥ svaṃ virajaṃ yogena susamāhitam|

kāṣṭhāṃ bhagavato dhyāyetsvanāsāgrāvalokanaḥ|| 12

अर्थ

जब योगका अभ्यास करते-करते चित्त निर्मल और एकाग्र हो जाय, तब नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि जमाकर इस प्रकार भगवान्‌की मूर्तिका ध्यान करे॥ १२॥✎ 326

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #326 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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