श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

लसत्पङ्कजकिंजल्कपीतकौशेयवाससम्।

श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम्॥ १४

lasatpaṅkajakiṃjalkapītakauśeyavāsasam|

śrīvatsavakṣasaṃ bhrājatkaustubhāmuktakandharam|| 14

अर्थ

कमलकी केसरके समान पीला रेशमी वस्त्र लहरा रहा है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न है और गलेमें कौस्तुभमणि झिलमिला रही है॥ १४॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें