देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥✎ 13121995
यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च।
स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम्॥ १
देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 380) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1312 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ज्ञान-दृष्टिके → ज्ञानदृष्टिके
#1995 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): श्रमिक → श्रमित