श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यथा सांख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते।

भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः१ प्रभो॥ २

yathā sāṃkhyeṣu kathitaṃ yanmūlaṃ tatpracakṣate|

bhaktiyogasya me mārgaṃ brūhi vistaraśaḥ prabho|| 2

अर्थ

देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥✎ 1312 1995

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—रतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 380)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1312 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ज्ञान-दृष्टिके → ज्ञानदृष्टिके
  • #1995 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): श्रमिक → श्रमित

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