bhūteṣu baddhavairasya na manaḥ śāntimṛcchati|| 23
अर्थ
जो भेददर्शी और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवोंके साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरोंमें विद्यमान मुझ आत्मासे ही द्वेष करता है, उसके मनको कभी शान्ति नहीं मिल सकती॥ २३॥
द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः।
भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति॥ २३
जो भेददर्शी और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवोंके साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरोंमें विद्यमान मुझ आत्मासे ही द्वेष करता है, उसके मनको कभी शान्ति नहीं मिल सकती॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 382) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/23/