॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.29.33
तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरः।
मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि संन्यस्तकर्मणः।
न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात्॥ ३३
tasmānmayyarpitāśeṣakriyārthātmā nirantaraḥ|
mayyarpitātmanaḥ puṃso mayi saṃnyastakarmaṇaḥ|
na paśyāmi paraṃ bhūtamakartuḥ samadarśanāt|| 33
अर्थ
उनकी अपेक्षा भी जो लोग अपने सम्पूर्ण कर्म, उनके फल तथा अपने शरीरको भी मुझे ही अर्पण करके भेदभाव छोड़कर मेरी उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार मुझे ही चित्त और कर्म समर्पण करनेवाले अकर्त्ता और समदर्शी पुरुषसे बढ़कर मुझे कोई अन्य प्राणी नहीं दीखता॥ ३३॥