श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः।

अग्‍निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मज्जति यद्भयात्॥ ४२

sravanti sarito bhītā notsarpatyudadhiryataḥ|

agnirindhe sagiribhirbhūrna majjati yadbhayāt|| 42

अर्थ

इसीके डरसे नदियाँ बहती हैं और समुद्र अपनी मर्यादासे बाहर नहीं जाता। इसीके भयसे अग्‍नि प्रज्वलित होती है और पर्वतोंके सहित पृथ्वी जलमें नहीं डूबती॥ ४२॥

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