श्रीकपिलदेवजी कहते हैं—माताजी! जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़ाया जानेवाला मेघसमूह उसके बलको नहीं जानता, उसी प्रकार यह जीव भी बलवान् कालकी प्रेरणासे भिन्न-भिन्न अवस्थाओं तथा योनियोंमें भ्रमण करता रहता है, किन्तु उसके प्रबल पराक्रमको नहीं जानता॥ १॥✎ 337338
तस्यैतस्य जनो नूनं नायं वेदोरुविक्रमम्।
काल्यमानोऽपि बलिनो वायोरिव घनावलिः॥ १
श्रीकपिलदेवजी कहते हैं—माताजी! जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़ाया जानेवाला मेघसमूह उसके बलको नहीं जानता, उसी प्रकार यह जीव भी बलवान् कालकी प्रेरणासे भिन्न-भिन्न अवस्थाओं तथा योनियोंमें भ्रमण करता रहता है, किन्तु उसके प्रबल पराक्रमको नहीं जानता॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 385) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)