श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

यं यमर्थमुपादत्ते दुःखेन सुखहेतवे।

तं तं धुनोति भगवान् पुमाञ्छोचति यत्कृते॥ २

yaṃ yamarthamupādatte duḥkhena sukhahetave|

taṃ taṃ dhunoti bhagavān pumāñchocati yatkṛte|| 2

अर्थ

जीव सुखकी अभिलाषासे जिस-जिस वस्तुको बड़े कष्टसे प्राप्त करता है, उसी-उसीको भगवान् काल विनष्ट कर देता है—जिसके लिये उसे बड़ा शोक होता है॥ २॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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