श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

शयानः परिशोचद्भिः परिवीतः५ स्वबन्धुभिः।

वाच्यमानोऽपि न ब्रूते कालपाशवशं गतः॥ १७

śayānaḥ pariśocadbhiḥ parivītaḥ svabandhubhiḥ|

vācyamāno'pi na brūte kālapāśavaśaṃ gataḥ|| 17

अर्थ

यह अपने शोकातुर बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ पड़ा रहता है और मृत्युपाशके वशीभूत हो जानेसे उनके बुलानेपर भी नहीं बोल सकता॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—परितश्‍च स्व०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 386)

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