श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

एवं कुटुम्बभरणे व्या६पृतात्माजितेन्द्रियः।✎ 1015

म्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधीः॥ १८

evaṃ kuṭumbabharaṇe vyāpṛtātmājitendriyaḥ|

mriyate rudatāṃ svānāmuruvedanayāstadhīḥ|| 18

अर्थ

इस प्रकार जो मूढ़ पुरुष इन्द्रियोंको न जीतकर निरन्तर कुटुम्ब-पोषणमें ही लगा रहता है, वह रोते हुए स्वजनोंके बीच अत्यन्त वेदनासे अचेत होकर मृत्युको प्राप्त होता है॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. ६

    प्रा० पा०—व्यावृता०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 386)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1015 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): व्या् → व्या

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें