वहाँ उसके शरीरको धधकती लकड़ियों आदिके बीचमें डालकर जलाया जाता है, कहीं स्वयं और दूसरोंके द्वारा काट-काटकर उसे अपना ही मांस खिलाया जाता है॥ २५॥
आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभिः।
आत्ममांसादनं क्वापि स्वकृत्तं परतोऽपि वा॥ २५
वहाँ उसके शरीरको धधकती लकड़ियों आदिके बीचमें डालकर जलाया जाता है, कहीं स्वयं और दूसरोंके द्वारा काट-काटकर उसे अपना ही मांस खिलाया जाता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 387) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/25/