शरीरको काटकर टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं। उसे हाथियोंसे चिरवाया जाता है, पर्वतशिखरोंसे गिराया जाता है अथवा जल या गढ़ेमें डालकर बन्द कर दिया जाता है॥ २७॥
कृन्तनं चावयवशो गजादिभ्यो भिदापनम्।
पातनं गिरिशृङ्गेभ्यो रोधनं चाम्बुगर्तयोः॥ २७
शरीरको काटकर टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं। उसे हाथियोंसे चिरवाया जाता है, पर्वतशिखरोंसे गिराया जाता है अथवा जल या गढ़ेमें डालकर बन्द कर दिया जाता है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 387) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/27/