॥ श्रीहरिः ॥
केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः।
याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम्॥ ३३
kevalena hyadharmeṇa kuṭumbabharaṇotsukaḥ|
yāti jīvo'ndhatāmisraṃ caramaṃ tamasaḥ padam|| 33
अर्थ
जो पुरुष निरी पापकी कमाईसे ही अपने परिवारका पालन करनेमें व्यस्त रहता है, वह अन्धतामिस्र नरकमें जाता है—जो नरकोंमें चरम सीमाका कष्टप्रद स्थान है॥ ३३॥
केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः।
याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम्॥ ३३
जो पुरुष निरी पापकी कमाईसे ही अपने परिवारका पालन करनेमें व्यस्त रहता है, वह अन्धतामिस्र नरकमें जाता है—जो नरकोंमें चरम सीमाका कष्टप्रद स्थान है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 388) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/30/33/