श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।

निरूढमूलहृदय आत्मानं बहु मन्यते॥ ६

ātmajāyāsutāgārapaśudraviṇabandhuṣu |

nirūḍhamūlahṛdaya ātmānaṃ bahu manyate|| 6

अर्थ

यह मूर्ख अपने शरीर, स्त्री, पुत्र, गृह, पशु, धन और बन्धु-बान्धवोंमें अत्यन्त आसक्त होकर उनके सम्बन्धमें नाना प्रकारके मनोरथ करता हुआ अपनेको बड़ा भाग्यशाली समझता है॥ ६॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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