श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

सन्दह्यमानसर्वाङ्ग एषामुद्वहनाधिना।

करोत्यविरतं मूढो दुरितानि दुराशयः॥ ७

sandahyamānasarvāṅga eṣāmudvahanādhinā|

karotyavirataṃ mūḍho duritāni durāśayaḥ|| 7

अर्थ

इनके पालन-पोषणकी चिन्तासे इसके सम्पूर्ण अंग जलते रहते हैं; तथापि दुर्वासनाओंसे दूषित हृदय होनेके कारण यह मूढ़ निरन्तर इन्हींके लिये तरह-तरहके पाप करता रहता है॥ ७॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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