इनके पालन-पोषणकी चिन्तासे इसके सम्पूर्ण अंग जलते रहते हैं; तथापि दुर्वासनाओंसे दूषित हृदय होनेके कारण यह मूढ़ निरन्तर इन्हींके लिये तरह-तरहके पाप करता रहता है॥ ७॥✎ 337338
सन्दह्यमानसर्वाङ्ग एषामुद्वहनाधिना।
करोत्यविरतं मूढो दुरितानि दुराशयः॥ ७
इनके पालन-पोषणकी चिन्तासे इसके सम्पूर्ण अंग जलते रहते हैं; तथापि दुर्वासनाओंसे दूषित हृदय होनेके कारण यह मूढ़ निरन्तर इन्हींके लिये तरह-तरहके पाप करता रहता है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 385) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/30/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)