श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

मनुष्ययोनिको प्राप्त हुए जीवकी गतिका वर्णन

श्रीभगवानुवाच

कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये।

स्त्रियाः प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतःकणाश्रयः॥ १

karmaṇā daivanetreṇa janturdehopapattaye|

striyāḥ praviṣṭa udaraṃ puṃso retaḥkaṇāśrayaḥ|| 1

अर्थ

श्रीभगवान् कहते हैं—माताजी! जब जीवको मनुष्य-शरीरमें जन्म लेना होता है, तो वह भगवान्‌की प्रेरणासे अपने पूर्वकर्मानुसार देहप्राप्तिके लिये पुरुषके वीर्यकणके द्वारा स्त्रीके उदरमें प्रवेश करता है॥ १॥✎ 339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #339 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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