सातवाँ महीना आरम्भ होनेपर उसमें ज्ञान-शक्तिका भी उन्मेष हो जाता है; परन्तु प्रसूतिवायुसे चलायमान रहनेके कारण वह उसी उदरमें उत्पन्न हुए विष्ठाके कीड़ोंके समान एक स्थानपर नहीं रह सकता॥ १०॥
आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपितः।
नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदरः॥ १०
सातवाँ महीना आरम्भ होनेपर उसमें ज्ञान-शक्तिका भी उन्मेष हो जाता है; परन्तु प्रसूतिवायुसे चलायमान रहनेके कारण वह उसी उदरमें उत्पन्न हुए विष्ठाके कीड़ोंके समान एक स्थानपर नहीं रह सकता॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 390) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/31/10/