श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

नाथमान ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः।

स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः॥ ११

nāthamāna ṛṣirbhītaḥ saptavadhriḥ kṛtāñjaliḥ|

stuvīta taṃ viklavayā vācā yenodare'rpitaḥ|| 11

अर्थ

तब सप्तधातुमय स्थूलशरीरसे बँधा हुआ वह देहात्मदर्शी जीव अत्यन्त भयभीत होकर दीन वाणीसे कृपा-याचना करता हुआ, हाथ जोड़कर उस प्रभुकी स्तुति करता है, जिसने उसे माताके गर्भमें डाला है॥ ११॥✎ 340 341

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #340 शब्दोंके बीचका स्थान: जोड़करउस → जोड़कर उस
  • #341 शब्दोंके बीचका स्थान: हुआवह → हुआ वह

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें