श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

जन्तुरुवाच

तस्योपसन्‍नमवितुं जगदिच्छयात्त-

नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम्।

सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे

येनेदृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा॥ १२

tasyopasannamavituṃ jagadicchayātta-

nānātanorbhuvi calaccaraṇāravindam|

so'haṃ vrajāmi śaraṇaṃ hyakutobhayaṃ me

yenedṛśī gatiradarśyasato'nurūpā|| 12

अर्थ

जीव कहता है—मैं बड़ा अधम हूँ; भगवान्‌ने मुझे जो इस प्रकारकी गति दिखायी है, वह मेरे योग्य ही है। वे अपनी शरणमें आये हुए इस नश्‍वर जगत‍्की रक्षाके लिये ही अनेक प्रकारके रूप धारण करते हैं; अतः मैं भी भूतलपर विचरण करनेवाले उन्हींके निर्भय चरणारविन्दोंकी शरण लेता हूँ॥ १२॥✎ 342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #342 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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