अतः मैं व्याकुलताको छोड़कर हृदयमें श्रीविष्णुभगवान्के चरणोंको स्थापितकर अपनी बुद्धिकी सहायतासे ही अपनेको बहुत शीघ्र इस संसाररूप समुद्रके पार लगा दूँगा, जिससे मुझे अनेक प्रकारके दोषोंसे युक्त यह संसार-दुःख फिर न प्राप्त हो॥ २१॥
तस्मादहं विगतविक्लव उद्धरिष्य
आत्मानमाशु तमसः सुहृदाऽऽत्मनैव।
भूयो यथा व्यसनमेतदनेकरन्ध्रं
मा मे भविष्यदुपसादितविष्णुपादः॥ २१
अतः मैं व्याकुलताको छोड़कर हृदयमें श्रीविष्णुभगवान्के चरणोंको स्थापितकर अपनी बुद्धिकी सहायतासे ही अपनेको बहुत शीघ्र इस संसाररूप समुद्रके पार लगा दूँगा, जिससे मुझे अनेक प्रकारके दोषोंसे युक्त यह संसार-दुःख फिर न प्राप्त हो॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 392) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/31/21/