कपिलदेवजी कहते हैं—माता! वह दस महीनेका जीव गर्भमें ही जब इस प्रकार विवेकसम्पन्न होकर भगवान्की स्तुति करता है, तब उस अधोमुख बालकको प्रसवकालकी वायु तत्काल बाहर आनेके लिये ढकेलती है॥ २२॥✎ 343
एवं कृतमतिर्गर्भे दशमास्यः स्तुवन्नृषिः।
सद्यः क्षिपत्यवाचीनं प्रसूत्यै सूतिमारुतः॥ २२
कपिलदेवजी कहते हैं—माता! वह दस महीनेका जीव गर्भमें ही जब इस प्रकार विवेकसम्पन्न होकर भगवान्की स्तुति करता है, तब उस अधोमुख बालकको प्रसवकालकी वायु तत्काल बाहर आनेके लिये ढकेलती है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 392) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/31/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)