श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यद्यसद्भिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमैः।

आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत्॥ ३२

yadyasadbhiḥ pathi punaḥ śiśnodarakṛtodyamaiḥ|

āsthito ramate jantustamo viśati pūrvavat|| 32

अर्थ

सन्मार्गमें चलते हुए यदि इसका किन्हीं जिह्वा और उपस्थेन्द्रियके भोगोंमें लगे हुए विषयी पुरुषोंसे समागम हो जाता है और यह उनमें आस्था करके उन्हींका अनुगमन करने लगता है, तो पहलेके समान ही फिर नारकी योनियोंमें पड़ता है॥ ३२॥

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