श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

सत्यं शौचं दया१ मौनं बुद्धिः श्रीर्ह्रीर्यशः क्षमा।

शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति सङ्क्षयम्॥ ३३

satyaṃ śaucaṃ dayā maunaṃ buddhiḥ śrīrhrīryaśaḥ kṣamā|

śamo damo bhagaśceti yatsaṅgādyāti saṅkṣayam|| 33

अर्थ

जिनके संगसे इसके सत्य, शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया, वाणीका संयम, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, लज्जा, यश, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा ऐश्‍वर्य आदि सभी सद‍्गुण नष्ट हो जाते हैं। उन अत्यन्त शोचनीय, स्त्रियोंके क्रीडामृग (खिलौना), अशान्त, मूढ़ और देहात्मदर्शी असत्पुरुषोंका संग कभी नहीं करना चाहिये॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तपो मौनं बुद्धिर्हीः श्रीर्यशः।

    (मुद्रित पृष्ठ 393)

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