श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु

योगस्य पारं परमारुरुक्षुः।

मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो

वदन्ति या निरयद्वारमस्य॥ ३९

saṅgaṃ na kuryātpramadāsu jātu

yogasya pāraṃ paramārurukṣuḥ|

matsevayā pratilabdhātmalābho

vadanti yā nirayadvāramasya|| 39

अर्थ

जो पुरुष योगके परम पदपर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवाके प्रभावसे आत्मा-अनात्माका विवेक हो गया हो, वह स्त्रियोंका संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुषके लिये नरकका खुला द्वार बताया गया है॥ ३९॥✎ 344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #344 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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