भगवान्की रची हुई यह जो स्त्रीरूपिणी माया धीरे-धीरे सेवा आदिके मिससे पास आती है, इसे तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान अपनी मृत्यु ही समझे॥ ४०॥✎ 344
योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता।
तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम्॥ ४०
भगवान्की रची हुई यह जो स्त्रीरूपिणी माया धीरे-धीरे सेवा आदिके मिससे पास आती है, इसे तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान अपनी मृत्यु ही समझे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 394) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/31/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)