श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता।

तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम्॥ ४०

yopayāti śanairmāyā yoṣiddevavinirmitā|

tāmīkṣetātmano mṛtyuṃ tṛṇaiḥ kūpamivāvṛtam|| 40

अर्थ

भगवान्‌की रची हुई यह जो स्त्रीरूपिणी माया धीरे-धीरे सेवा आदिके मिससे पास आती है, इसे तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान अपनी मृत्यु ही समझे॥ ४०॥✎ 344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #344 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें