श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः।

पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः॥ १७

rajasā kuṇṭhamanasaḥ kāmātmāno'jitendriyāḥ|

pitṝn yajantyanudinaṃ gṛheṣvabhiratāśayāḥ|| 17

अर्थ

उनकी बुद्धि रजोगुणकी अधिकताके कारण कुण्ठित रहती है, हृदयमें कामनाओंका जाल फैला रहता है और इन्द्रियाँ उनके वशमें नहीं होतीं; बस, अपने घरोंमें ही आसक्त होकर वे नित्यप्रति पितरोंकी पूजामें लगे रहते हैं॥ १७॥✎ 347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्‌की

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