श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः।

कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः॥ १८

traivargikāste puruṣā vimukhā harimedhasaḥ|

kathāyāṃ kathanīyoruvikramasya madhudviṣaḥ|| 18

अर्थ

ये लोग अर्थ, धर्म और कामके ही परायण होते हैं; इसलिये जिनके महान् पराक्रम अत्यन्त कीर्तनीय हैं, उन भवभयहारी श्रीमधुसूदनभगवान्‌की कथा-वार्ताओंसे तो ये विमुख ही रहते हैं॥ १८॥✎ 347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्‌की

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