श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

नूनं दैवेन विहता ये चाच्युतकथासुधाम्।

हित्वा शृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः॥ १९

nūnaṃ daivena vihatā ye cācyutakathāsudhām|

hitvā śṛṇvantyasadgāthāḥ purīṣamiva viḍbhujaḥ|| 19

अर्थ

हाय! विष्ठाभोजी कूकर-सूकर आदि जीवोंके विष्ठा चाहनेके समान जो मनुष्य भगवत्कथामृतको छोड़कर निन्दित विषय-वार्ताओंको सुनते हैं—वे तो अवश्य ही विधाताके मारे हुए हैं, उनका बड़ा ही मन्द भाग्य है॥ १९॥

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