श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

देवहूतिको तत्त्वज्ञान एवं मोक्षपदकी प्राप्ति

मैत्रेय उवाच

एवं निशम्य कपिलस्य वचो जनित्री

सा कर्दमस्य दयिता किल देवहूतिः।

विस्रस्तमोहपटला तमभिप्रणम्य

तुष्टाव तत्त्वविषयाङ्कितसिद्धिभूमिम्॥ १

evaṃ niśamya kapilasya vaco janitrī

sā kardamasya dayitā kila devahūtiḥ|

visrastamohapaṭalā tamabhipraṇamya

tuṣṭāva tattvaviṣayāṅkitasiddhibhūmim|| 1

अर्थ

मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! श्रीकपिल भगवान्‌के ये वचन सुनकर कर्दमजीकी प्रिय पत्‍नी माता देवहूतिके मोहका पर्दा फट गया और वे तत्त्वप्रतिपादक सांख्यशास्त्रके ज्ञानकी आधारभूमि भगवान् श्रीकपिलजीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं॥ १॥✎ 1314

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1314 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तत्त्व-प्रतिपादक → तत्त्वप्रतिपादक

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