॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.33.2
देवहूतिरुवाच
अथाप्यजोऽन्तःसलिले शयानं
भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते।
गुणप्रवाहं सदशेषबीजं
दध्यौ स्वयं यज्जठराब्जजातः॥ २
athāpyajo'ntaḥsalile śayānaṃ
bhūtendriyārthātmamayaṃ vapuste|
guṇapravāhaṃ sadaśeṣabījaṃ
dadhyau svayaṃ yajjaṭharābjajātaḥ|| 2
अर्थ
देवहूतिजीने कहा—कपिलजी! ब्रह्माजी आपके ही नाभिकमलसे प्रकट हुए थे। उन्होंने प्रलयकालीन जलमें शयन करनेवाले आपके पंचभूत, इन्द्रिय, शब्दादि विषय और मनोमय विग्रहका, जो सत्त्वादि गुणोंके प्रवाहसे युक्त, सत्स्वरूप और कार्य एवं कारण दोनोंका बीज है, ध्यान ही किया था॥ २॥