श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

य इदमनुशृणोति योऽभिधत्ते

कपिलमुनेर्मतमात्मयोगगुह्यम् ।

भगवति कृतधीः सुपर्णकेता-

वुपलभते भगवत्पदारविन्दम्॥ ३७

ya idamanuśṛṇoti yo'bhidhatte

kapilamunermatamātmayogaguhyam |

bhagavati kṛtadhīḥ suparṇaketā-

vupalabhate bhagavatpadāravindam|| 37

अर्थ

यह कपिलदेवजीका मत अध्यात्मयोगका गूढ़ रहस्य है। जो पुरुष इसका श्रवण या वर्णन करता है, वह भगवान् गरुडध्वजकी भक्तिसे युक्त होकर शीघ्र ही श्रीहरिके चरणारविन्दोंको प्राप्त करता है॥ ३७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां
संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥

॥ इति तृतीयः स्कन्धः समाप्तः॥

॥ हरिः ॐ तत्सत्॥

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