॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.4.16
कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते
दुर्गाश्रयोऽथारिभयात्पलायनम् ।
कालात्मनो यत्प्रमदायुताश्रयः
स्वात्मन्रतेः खिद्यति धीर्विदामिह॥ १६
karmāṇyanīhasya bhavo'bhavasya te
durgāśrayo'thāribhayātpalāyanam |
kālātmano yatpramadāyutāśrayaḥ
svātmanrateḥ khidyati dhīrvidāmiha|| 16
अर्थ
प्रभो! आप निःस्पृह होकर भी कर्म करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, कालरूप होकर भी शत्रुके डरसे भागते हैं और द्वारकाके किलेमें जाकर छिप रहते हैं तथा स्वात्माराम होकर भी सोलह हजार स्त्रियोंके साथ रमण करते हैं—इन विचित्र चरित्रोंको देखकर विद्वानोंकी बुद्धि भी चक्करमें पड़ जाती है॥ १६॥