श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मन्त्रेषु मां वा उपहूय यत्त्व-

मकुण्ठिताखण्डसदात्मबोधः ।

पृच्छेः प्रभो मुग्ध इवाप्रमत्त-

स्तन्‍नो मनो मोहयतीव देव॥ १७

mantreṣu māṃ vā upahūya yattva-

makuṇṭhitākhaṇḍasadātmabodhaḥ |

pṛccheḥ prabho mugdha ivāpramatta-

stanno mano mohayatīva deva|| 17

अर्थ

देव! आपका स्वरूपज्ञान सर्वथा अबाध और अखण्ड है। फिर भी आप सलाह लेनेके लिये मुझे बुलाकर जो भोले मनुष्योंकी तरह बड़ी सावधानीसे मेरी सम्मति पूछा करते थे, प्रभो! आपकी वह लीला मेरे मनको मोहित-सा कर देती है॥ १७॥

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