श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ज्ञानं परं स्वात्मरहःप्रकाशं

प्रोवाच कस्मै भगवान् समग्रम्।

अपि क्षमं नो ग्रहणाय भर्त-

र्वदाञ्जसा यद् वृजिनं तरेम॥ १८

jñānaṃ paraṃ svātmarahaḥprakāśaṃ

provāca kasmai bhagavān samagram|

api kṣamaṃ no grahaṇāya bharta-

rvadāñjasā yad vṛjinaṃ tarema|| 18

अर्थ

स्वामिन्! अपने स्वरूपका गूढ़ रहस्य प्रकट करनेवाला जो श्रेष्ठ एवं समग्र ज्ञान आपने ब्रह्माजीको बतलाया था, वह यदि मेरे समझनेयोग्य हो तो मुझे भी सुनाइये, जिससे मैं भी इस संसार-दुःखको सुगमतासे पार कर जाऊँ’॥ १८॥

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