श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नोद्धवोऽण्वपि मन्‍न्यूनो यद‍्गुणैर्नार्दितः प्रभुः।

अतो मद्वयुनं लोकं ग्राहयन्‍निह तिष्ठतु॥ ३१

noddhavo'ṇvapi mannyūno yadguṇairnārditaḥ prabhuḥ|

ato madvayunaṃ lokaṃ grāhayanniha tiṣṭhatu|| 31

अर्थ

उद्धव मुझसे अणुमात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे आत्मजयी हैं, विषयोंसे कभी विचलित नहीं हुए। अतः लोगोंको मेरे ज्ञानकी शिक्षा देते हुए वे यहीं रहें’॥ ३१॥✎ 208

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #208 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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