उद्धव मुझसे अणुमात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे आत्मजयी हैं, विषयोंसे कभी विचलित नहीं हुए। अतः लोगोंको मेरे ज्ञानकी शिक्षा देते हुए वे यहीं रहें’॥ ३१॥✎ 208
नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दितः प्रभुः।
अतो मद्वयुनं लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु॥ ३१
उद्धव मुझसे अणुमात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे आत्मजयी हैं, विषयोंसे कभी विचलित नहीं हुए। अतः लोगोंको मेरे ज्ञानकी शिक्षा देते हुए वे यहीं रहें’॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 252) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/4/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)