श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नैतच्चित्रं त्वयि क्षत्तर्बादरायणवीर्यजे।

गृहीतोऽनन्यभावेन यत्त्वया हरिरीश्‍वरः॥ १९

naitaccitraṃ tvayi kṣattarbādarāyaṇavīryaje|

gṛhīto'nanyabhāvena yattvayā harirīśvaraḥ|| 19

अर्थ

आप श्रीव्यासजीके औरस पुत्र हैं; इसलिये आपके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि आप अनन्यभावसे सर्वेश्‍वर श्रीहरिके ही आश्रित हो गये हैं॥ १९॥✎ 210 211

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #210 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #211 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में

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