श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः।

आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्‍वस्यास्य सिसृक्षया॥ २८

so'pyaṃśaguṇakālātmā bhagavaddṛṣṭigocaraḥ|

ātmānaṃ vyakarodātmā viśvasyāsya sisṛkṣayā|| 28

अर्थ

फिर चिदाभास, गुण और कालके अधीन उस महत्तत्त्वने भगवान्‌की दृष्टि पड़नेपर इस विश्‍वकी रचनाके लिये अपना रूपान्तर किया॥ २८॥✎ 212 213 214

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें