भगवान्की दृष्टि जब आकाशपर पड़ी, तब उससे फिर काल, माया और चिदाभासके योगसे स्पर्शतन्मात्र हुआ और उसके विकृत होनेपर उससे वायुकी उत्पत्ति हुई॥ ३२॥✎ 212213214
कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः।
नभसोऽनुसृतं स्पर्शं विकुर्वन्निर्ममेऽनिलम्॥ ३२
भगवान्की दृष्टि जब आकाशपर पड़ी, तब उससे फिर काल, माया और चिदाभासके योगसे स्पर्शतन्मात्र हुआ और उसके विकृत होनेपर उससे वायुकी उत्पत्ति हुई॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 256) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/5/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)