श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तथापरे चात्मसमाधियोग-

बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्।

त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति

तेषां श्रमः स्यान्‍न तु सेवया ते॥ ४६

tathāpare cātmasamādhiyoga-

balena jitvā prakṛtiṃ baliṣṭhām|

tvāmeva dhīrāḥ puruṣaṃ viśanti

teṣāṃ śramaḥ syānna tu sevayā te|| 46

अर्थ

दूसरे धीर पुरुष चित्तनिरोधरूप समाधिके बलसे आपकी बलवती मायाको जीतकर आपमें ही लीन तो हो जाते हैं, पर उन्हें श्रम बहुत होता है; किन्तु आपकी सेवाके मार्गमें कुछ भी कष्ट नहीं है॥ ४६॥

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