श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाऽऽद्य

त्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभिः स्म।

सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं

न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते॥ ४७

tatte vayaṃ lokasisṛkṣayā''dya

tvayānusṛṣṭāstribhirātmabhiḥ sma|

sarve viyuktāḥ svavihāratantraṃ

na śaknumastatpratihartave te|| 47

अर्थ

आदिदेव! आपने सृष्टिरचनाकी इच्छासे हमें त्रिगुणमय रचा है। इसलिये विभिन्‍न स्वभाववाले होनेके कारण हम आपसमें मिल नहीं पाते और इसीसे आपकी क्रीडाके साधनरूप ब्रह्माण्डकी रचना करके उसे आपको समर्पण करनेमें असमर्थ हो रहे हैं॥ ४७॥

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