॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.6.1
अथ षष्ठोऽध्यायः
विराट् शरीरकी उत्पत्ति
ऋषिरुवाच
इति तासां स्वशक्तीनां सतीनामसमेत्य सः।
प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः॥ १
iti tāsāṃ svaśaktīnāṃ satīnāmasametya saḥ|
prasuptalokatantrāṇāṃ niśāmya gatimīśvaraḥ|| 1
अर्थ
मैत्रेय ऋषिने कहा—सर्वशक्तिमान् भगवान्ने जब देखा कि आपसमें संगठित न होनेके कारण ये मेरी महत्तत्त्व आदि शक्तियाँ विश्वरचनाके कार्यमें असमर्थ हो रही हैं, तब वे कालशक्तिको स्वीकार करके एक साथ ही महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पंचतन्मात्रा और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ—इन तेईस तत्त्वोंके समुदायमें प्रविष्ट हो गये॥ १-२॥✎ 216 217 218 219 1300 1301