इसके पश्चात् उसके हाथ प्रकट हुए; उनमें अपनी ग्रहण-त्यागरूपा शक्तिके सहित देवराज इन्द्रने प्रवेश किया, इस शक्तिसे जीव अपनी जीविका प्राप्त करता है॥ २१॥✎ 220
हस्तावस्य विनिर्भिन्नाविन्द्रः स्वर्पतिराविशत्।
वार्तयांशेन पुरुषो यया वृतिं प्रपद्यते॥ २१
इसके पश्चात् उसके हाथ प्रकट हुए; उनमें अपनी ग्रहण-त्यागरूपा शक्तिके सहित देवराज इन्द्रने प्रवेश किया, इस शक्तिसे जीव अपनी जीविका प्राप्त करता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने