श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पादावस्य विनिर्भिन्‍नौ लोकेशो विष्णुराविशत्।

गत्या स्वांशेन पुरुषो यया प्राप्यं प्रपद्यते॥ २२

pādāvasya vinirbhinnau lokeśo viṣṇurāviśat|

gatyā svāṃśena puruṣo yayā prāpyaṃ prapadyate|| 22

अर्थ

जब इसके चरण उत्पन्‍न हुए, तब उनमें अपनी शक्ति गतिके सहित लोकेश्‍वर विष्णुने प्रवेश किया—इस गतिशक्तिद्वारा जीव अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचता है॥ २२॥ फिर इसके बुद्धि उत्पन्‍न हुई; अपने इस स्थानमें अपने अंश बुद्धिशक्तिके साथ वाक्पति ब्रह्माने प्रवेश किया, इस बुद्धिशक्तिसे जीव ज्ञातव्य विषयोंको जान सकता है॥ २३॥ फिर इसमें हृदय प्रकट हुआ; उसमें अपने अंश मनके सहित चन्द्रमा स्थित हुआ। इस मनःशक्तिके द्वारा जीव संकल्प-विकल्पादिरूप विकारोंको प्राप्त होता है॥ २४॥ तत्पश्चात् विराट् पुरुषमें अहंकार उत्पन्‍न हुआ; इस अपने आश्रयमें क्रियाशक्तिसहित अभिमान (रुद्र)-ने प्रवेश किया। इससे जीव अपने कर्तव्यको स्वीकार करता है॥ २५॥ अब इसमें चित्त प्रकट हुआ। उसमें चित्तशक्तिके सहित महत्तत्त्व (ब्रह्मा) स्थित हुआ; इस चित्तशक्तिसे जीव विज्ञान (चेतना)-को उपलब्ध करता है॥ २६॥ इस विराट् पुरुषके सिरसे स्वर्गलोक, पैरोंसे पृथ्वी और नाभिसे अन्तरिक्ष (आकाश) उत्पन्‍न हुआ। इनमें क्रमशः सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंके परिणामरूप देवता, मनुष्य और प्रेतादि देखे जाते हैं॥ २७॥ इनमें देवतालोग सत्त्वगुणकी अधिकताके कारण स्वर्गलोकमें, मनुष्य और उनके उपयोगी गौ आदि जीव रजोगुणकी प्रधानताके कारण पृथ्वीमें तथा तमोगुणी स्वभाववाले होनेसे रुद्रके पार्षदगण (भूत, प्रेत आदि) दोनोंके बीचमें स्थित भगवान्‌के नाभिस्थानीय अन्तरिक्षलोकमें रहते हैं॥ २८-२९॥

यह व्याख्या श्लोक 3.6.22 से 3.6.29 तककी एक साथ है।

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